धमकी भरे फोन और सोशल मीडिया वीडियो से नहीं डिगूंगा, सार्वजनिक पार्क के लिए लड़ाई जारी रहेगी: प्रकाश वीर आर्य
कानपुर के गोविन्द नगर ब्लॉक-8 सार्वजनिक पार्क प्रकरण में सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश वीर आर्य ने कथित धमकी भरे फोन कॉल और सोशल मीडिया वीडियो के जरिए दबाव बनाने के आरोप लगाए हैं। आर्य ने कहा कि वह सार्वजनिक पार्क की भूमि और हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन की मांग को लेकर अपनी कानूनी एवं लोकतांत्रिक लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने मंदिर संचालन को लेकर भी सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच, स्थल के संयुक्त निरीक्षण और सरकारी अभिलेखों की जांच की मांग की है। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में WPIL No. 1023/2026 तथा उससे संबंधित Contempt Application (Civil) No. 4779/2026 से जुड़ा है।
धमकी भरे फोन और सोशल मीडिया वीडियो से नहीं डिगूंगा, सार्वजनिक पार्क के लिए लड़ाई जारी रहेगी: प्रकाश वीर आर्य
कानपुर। गोविन्द नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं भाजपा साहित्य प्रचार विभाग, कानपुर दक्षिण जिले के संयोजक प्रकाश वीर आर्य ने आरोप लगाया है कि उन्हें फोन कॉल के माध्यम से धमकाया जा रहा है तथा सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की जा रही हैं। आर्य का कहना है कि इस तरह के दबाव से वह सार्वजनिक पार्क से जुड़े अपने प्रयासों से पीछे नहीं हटेंगे।
आर्य ने कहा कि सार्वजनिक पार्क की भूमि और न्यायालय के आदेश के अनुपालन को लेकर वह कानूनी एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि उनके विरुद्ध मंदिर तोड़ने अथवा पार्क पर कब्जा करने जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं। आर्य ने आरोप लगाने वालों से इन दावों के प्रमाण सार्वजनिक करने की मांग की और कहा कि वास्तविक स्थिति सरकारी अभिलेखों तथा न्यायालय के आदेश से स्पष्ट होनी चाहिए।
मंदिर के संचालन को लेकर भी सवाल
प्रकाश वीर आर्य ने पार्क परिसर में स्थित मंदिर के संचालन को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने मंदिर के पुजारी शिवांग गुप्ता पर आरोप लगाते हुए कहा कि स्थानीय लोगों को पूजा-अर्चना में परेशानी होने तथा महिलाओं सहित करीब 50 लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आई हैं।
आर्य ने कहा कि यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित पक्ष निष्पक्ष जांच के लिए सामने आए और स्थानीय लोगों के बयान दर्ज किए जाएं। उन्होंने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
आर्य ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी मंदिर या सनातन धर्म से नहीं है। उनका कहना है कि उनका मुख्य सवाल सार्वजनिक पार्क की भूमि के वैधानिक उपयोग और स्थानीय नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा है।
हाईकोर्ट के आदेश का हवाला
आर्य ने बताया कि विवाद WPIL No. 1023/2026 में 22 अप्रैल 2026 को पारित इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से जुड़ा है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में भी Contempt Application (Civil) No. 4779/2026 को इसी आदेश के कथित अनुपालन से संबंधित बताया गया है। 28 जुलाई 2026 के न्यायालयीय आदेश में संबंधित पक्ष को आदेश के अनुपालन के लिए अतिरिक्त समय दिए जाने का उल्लेख है।
आर्य का कहना है कि ऐसे में सोशल मीडिया और प्रेस वार्ता के माध्यम से आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय संबंधित पक्षों को न्यायालय के आदेश और सरकारी अभिलेखों के आधार पर अपना पक्ष रखना चाहिए।
रामजन्मभूमि आंदोलन का भी किया उल्लेख
प्रकाश वीर आर्य ने अपने पुराने सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी और उस समय उन पर रासुका (NSA) के तहत कार्रवाई हुई थी। उन्होंने दावा किया कि वह फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में बजरंग दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरी दीक्षित के साथ बंद रहे थे।
आर्य ने कहा कि यदि कोई उनकी धार्मिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाता है तो संबंधित लोगों को भी उस दौर में अपनी भूमिका और भागीदारी स्पष्ट करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या धार्मिक प्रतिस्पर्धा का विषय बनाने के बजाय सार्वजनिक पार्क और न्यायालय के आदेश के अनुपालन तक सीमित रखा जाना चाहिए।
संयुक्त निरीक्षण और अभिलेखों की जांच की मांग
आर्य ने प्रशासन से मांग की कि पूरे प्रकरण में स्थल का संयुक्त निरीक्षण कराया जाए, संबंधित सरकारी अभिलेखों की जांच की जाए और हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए।
उन्होंने कहा कि यदि उनके विरुद्ध धमकी, आपत्तिजनक या मानहानिकारक सामग्री का प्रसारण जारी रहता है तो वह कॉल रिकॉर्ड, वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री सुरक्षित रखकर उचित वैधानिक कार्रवाई करेंगे।
उन्होंने दोहराया कि उनका उद्देश्य किसी मंदिर या धर्म के विरुद्ध जाना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक पार्क की भूमि के वैधानिक उपयोग और न्यायालय के आदेश के अनुपालन से जुड़े सवालों को उठाना है।
नोट: इस समाचार में लगाए गए आरोप संबंधित पक्ष के कथन/दावे के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा अंतिम सत्यता संबंधित प्रशासनिक जांच या न्यायिक प्रक्रिया से निर्धारित होगी।

